Thursday, May 13, 2010

सच्चाई से रुबरु

हमने अपने हर एक लेख के जरिए कुदरत के कम हो रहे ख़जाने को संजोने की बात कही, पहले हमने उनपर अमल किया तब आपसे कहा। आज हम इन सारी बातों से परे आपको प्रकृति से जुड़ी सच्चाई से रुबरु कराएंगे। जिसे जानकर वो लोग जो अभी भी ये सोच रहे हैं कि...प्रकृति के मूल्यवान तत्वों को संयोजित करना सरकार का काम है शायद आगे आएं... संयुक्त राष्ट्र के एक सर्वेक्षण में चेतावनी दी गई है कि...पृथ्वी पर जारी प्रकृति के विनाश से राष्ट्रों की अर्थव्यवस्था जल्द ही प्रभावित होना शुरु हो जाएगी। जीबीओ-3 यानी थर्ड ग्लोबल बायोडाइवर्सिटी ऑउटलुक का कहना है कि कुछ परितंत्र यानी इकोसिस्टम जल्दी ही ऐसे बिंदु पर पहुंचने वाले हैं जहां से वे मानव के लिए जल्द ही कम लाभदायक होने लगेंगे। इन गिरावटों में जंगलों का तेजी से कम होते जाना, पानी के रास्तों में शैवाल का फैल जाना और बड़े पैमाने पर मूंगे की चट्टानों का मरते जाना शामिल है। पिछले महीने वैज्ञानिकों ने इस बात की पुष्टि की थी कि...सरकारें 2010 तक जैव विविधता में होने वाली लगातार कमी पर रोक लगाने के अपने लक्ष्य को पूरा करने में विफल रही हैं। जिससे हम लोग लगातार जैव विविधता खो रहे हैं। पहले के मुकाबले में इसकी दर 1000 गुना ज्यादा है। संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि स्तनपाई, रेंगने वाले, पक्षी, जलथलचर और मछलियों की प्रजातियां 1970 से 2006 के बीच एक तिहाई कम हो गई हैं। 2002 में जोहांसबर्ग में हुई बैठक में जैव विविधता में होने वाली पर लगाम कसने के लिए 2010 का लक्ष्य तय किया गया था। लेकिन कोई सुधार ने देखते हुए ये साफ तौर पर स्पष्ट है कि ऐसा नहीं हो सकता...यहां तक की बैठक में तय किए गए 21 सहायक लक्ष्यों में से कोई भी पूरा नहीं किया जा सका है। संयुक्त राष्ट्र के आईयूसीएन यानी प्रकृति संरक्षण के अंतरराष्ट्रीय संघ के उपाध्यक्ष बिल जैक्सन के मुताबिक, 21% स्तनधारी, 30% जलथलचर, 12% पक्षी और 27% चट्टान बनाने वाले मूंगे लुप्त होने की कगार पर हैं। और अगर इसी अनुपात में शेयर के दामों में नुकसान हो तो दुनिया भर में इसके प्रति जबरजस्त प्रतिक्रिया फैल जाएगी। संयुक्त राष्ट्र का मानना है कि प्रकृति के नुकसान में और आर्थिक नुकसान में रुपात्मक से ज्यादा संबंध है। इकोसिस्टम और जैव विविधता की अर्थव्यवस्था के एक प्रोजेक्ट के ज़रिए इस बात को जानने की कोशिश की जा रही है कि प्रकृति के देनों का मूल्यांकन किया जा सके...जैसे हवा, पानी को शुद्ध करने, तूफानों से बचाने में तट के जरिए प्रदान की जाने वाली सुरक्षा और इकोटूरिज्म के लिए वाइल्डलाइफ पर कितना खर्च आता है। इसका मतलब ये हुआ कि जब ये सेवाएं खत्म हो जाएंगी या खराब हो जाएंगी तो इनकी जगह पर जो चीज आएगी उसका खर्च समाज के खजाने पर पड़ेगा। इस प्रोजेक्ट ने जंगलों के वार्षिक नुकसान का अंदाजा दो से पांच खरब अमेरिकी डॉलर लगाया है जोकि किसी भी आर्थिक संकट को बौना बना देता है।

Wednesday, May 12, 2010

उत्तरदायित्व

कल हमने आप सभी का शुक्रिया अदा किया था...जो हमारे साथ जुड़े और उन्हें भी किया जो नहीं जुड़े या जुड़ना चाहते हैं...पर आपका हमारे साथ सिर्फ जुड़ जाना ही काफी नहीं है। शब्दों के जरिए आपसे कही गई हमारी बातों पर हम आपकी प्रतिक्रिया भी जानना चाहते हैं...हमें अच्छा लगेगा और हमें हमारी गलतियां भी पता लगेंगी। गलती से याद आया, पहले कभी एक कहानी सुनी थी जिसके उद्देश्य को ध्यान में रखकर किया गया काम हमारे लिए हमेशा आसान होता है। छोटी सी कहानी है, हो सकता है आप सभी ने सुनी भी हो...फिर भी आपसे उस कहानी को कहना चाहेंगे। कहानी किसी बड़े बिजनेस मेन या किसी बहुत बड़े आदमी की नहीं है। ये कहानी उस आम आदमी की है, जो हमें जिंदगी में आगे बढ़ने के सही मायने सीखा जाता है। कहानी एक इंसान की है, जो आम होकर भी आम नहीं है। “किसी एक सुन्दर से शहर में अपने रंगों की कला से कोरे पन्नों में रंग भरने वाले एक कलाकार रहता था। जो खुशी से झूमता और हमेशा हंसता रहता था। अपने ब्रश पर तरह-तरह के रंगों को लगा पन्नों को रंगता और खुश रहता...पर एक दिन उसे लगा कि कोरे पन्नों पर तो कई रंग हैं लेकिन उसके आस-पास रह रहे लोगों की जिंदगी से तो रंग शायद उड़ ही गए हैं...वजह वो पूरा समय खुद की कमी को सुधारने करने के बजाय दूसरों में कमी निकालते रहते हैं। खैर पेंटर को इस बात का एहसास हुआ और उसने बाकी लोगों को भी इस बात का एहसास दिलाने की ठानी। और पहुंच गया अपनी बनायीं एक तस्वीर को बाज़ार में लेकर। उसने वो तस्वीर बाज़ार में रख दी और उस पर लिख दिया-‘इसमें आपको जो भी गलतियाँ दिखे उस पर कृपया सही का निशान लगा दीजिए’। इतना लिख पेंटर वहां से चला गया, जब वो दूसरे दिन वापस आया तो तस्वीर में ऐसी कोई जगह नहीं थी जहां निशान न लगा हो ...! यह देख कर उसे लगा की क्या में इतना बुरा कलाकार हूँ । अगले दिन वही तस्वीर वो दोबारा बनाकर उसी बाज़ार में गया और उस पर लिख दिया-‘इसमें जो गलतियां हैं उसे सुधार दीजिए’। जब वो उस तस्वीर को लेने आया तो उसे बहुत आश्चर्य हुआ...वहीं पेंटिंग जिसमें लोगों को कल तक कई गलतियां नजर आ रही थीं उसमें उन्हें आज सुधार के लिए कुछ दिखाई नहीं दिया। पेंटर ने ऐसा करने का अपना मकसद लोगों के सामने रखा तब कहीं जाकर उन्हें अपनी गलती का एहसास हुआ ”। इस कहानी को कहने का हमारा मकसद भी बस इतना ही है कि गलतियां ढूंढना तो बहुत आसान होता है, पर जब उन्हें सही करने का वक्त आता है तो कोई भी उसे सही करने आगे नहीं आता...इसलिए सिर्फ कमियां न ढूंढें अगर कमियाँ है ,तो उन्हें सुधरने का उत्तरदायित्व भी तो हमारा है.दुसरे...दूसरे पर्यावरण प्रदूषित कर रहे हैं...ये तो हम देख रहे हैं लेकिन इस बात पर गौर नहीं करते कि अपने बाग से फूल हम भी तो उजाड़ रहे हैं। घर बड़ा चाहिए आखिर कमा किसलिए रहे हैं, तो सवाल है सोना तो बस एक पलंग पर ही है। तो दूसरे के घर के बाहर पड़ा कूड़ा देखना बंद करिए और अपने घर का कूड़ा देखिए...और अपना आशियां साफ रखिए कुदरत अपने आप सवंर जाएगी...

BECAUSE EVERY PROBLEM HAS A GREAT SOLUTION.

Tuesday, May 11, 2010

DO HAATH

शुक्रिया, आपने हमें समझने की कोशिश की और हमारी इस छोटी सी कोशिश में हमारे साथ आगे आए। हमें उम्मीद है कि ये सफर ऐसे ही चलता रहेगा और ये कारवां और आगे बढ़ेगा। फिर एक दिन ऐसा भी जरुर आएगा जब हम अपनीकोशिशों के जरिए सारी कुदरत को अपना आशियां बना सकेंगे। आपको जानकर खुशी होगी कि हमने अपने इस प्रयास में एक कदम आगे बढ़ाने की पहल भी कर दी है। हम कामयाब हों इसके लिए उम्मीद करते हैं आप सबकी दुआएं हमारे साथ होंगी। हम तो प्रकृति को बचाने के संकल्प के साथ आगे बढ़ चुके हैं...अब बारी आपकी है, आप भी आगे आइये कुछ सही एक पेड़ ही लगाइये। ये हमें और हमारी धरती को लगातार दूषित कर रहे पर्यावरण रुपी राक्षस से बचाएगा। हम कोशिश कर सकते हैं प्रकृति के दुश्मनों से प्रकृति को बचाने की, लेकिन जहां पेड़ों की कटाई की वजह से पर्यावरण इतना प्रदूषित हो चुका है...तो पूरी तरह सही एक-एक पेड़ लगाकर प्रदूषित हो रही प्रकृति को बचा तो सकते हैं। हम अपने घर को साफ रखने के लिए घर की गंदगी को उसी कुदरत के हवाले कर देते हैं...जिससे हमारे घर-आंगन को रोशनी मिलती है। हम गंदा कर रहे हैं अपने उस आशियाने को जिसने अगर कड़ी धूप में जलाकर हमें जिंदगी जीने के सही मायने सिखाए हैं...तो वहीं पानी की बरसात कर ठंडक भी पहुंचायी है। गंदा हम सभी कर रहे हैं और दोष देते हैं अपने साथ वालों को...प्रदूषण हमारी गाड़ी भी फैलाती है पर धुआं नजर आता है दूसरे की गाड़ी का...करना कुछ नहीं बस सरकार और दूसरों को दोष देने के बजाय, दो कदम चलकर कूड़ेदान तक ही तो जाना है,गाड़ी की सर्विसिंग ही तो करानी है। वो कहते हैं दो हाथ हजारों को मार नहीं सकते पर दो हाथ हजारों को नमन तो कर सकते हैं...ऐसे ही दो हाथ सब कुछ सही नहीं कर सकते पर दो हाथ एक पेड़ तो लगा सकते हैं...

Sunday, May 9, 2010

जिंदगी की तलाश

मदर्स डे बीत गया और हमने अपनी-अपनी माओं का शुक्रिया अदा कर उन्हें प्यार भरे तोहफ़े भी दे दिए..पर कल हमने अपने शब्दों में आपसे कुछ और भी कहा था, नहीं पता कितने लोगों ने हमारी बातों को गौर किया और सबसे बड़ी बात पता नहीं कितने लोगों ने उसपर अमल किया। खैर आकड़ों में तो नहीं कहा जा सकता है, पर हमें उम्मीद जरुर है कि कुछ दिलों ने संकल्प पूरा करने का संकल्प जरुर लिया होगा। हम ऐसे लोगों का शुक्रिया अदा करते हैं, पर वहीं अभी भी ऐसे लोग हैं जो इस बात को सिर्फ एक मामूली बात समझ कर भूल भी गए होंगे। हम ऐसे लोगों से ही अपने शब्दों के जरिए कुछ कहना चाहते हैं। जरुरी नहीं है कि किसी काम को करने के लिए आपके पास पैसा हो...बस एक सही सोच और एक सही दिशा की जरुरत है किसी अच्छे काम को करने के लिए, हमने आपको हमसे मिलवाया क्या करना चाहते हैं ये बताया, लेकिन आपके सहयोग से ये नेक काम पूरा नहीं हो सकता, ये हमारा स्वार्थ नहीं हम, आप और सबकी जरुरत है। असीम गुणों से भरे कुदरत के खजाने को खाली होने से बचाना हम सबका कर्तव्य है, ताकि आगे हमारे घर में खजाना भरा रहे। जिन्होंने ऐसा किया, जो कर रहे हैं या जो करना चाहते हैं उन्होंने बहुत अच्छा किया। पर जो नहीं कर रहे उन्हें करना चाहिए और जो नहीं कर पा रहे उन्हें मदद तो करनी ही चाहिए, जब ऐसा सोच लेंगे तो फिर वो दिन दूर नहीं जब हम बिना किसी प्राकृतिक आपदा के डर के खुशहाल जिंदगी बसर करेंगे। हम इस जिंदगी की तलाश में आगे बढ़ चुके हैं और उम करते हैं आप हमारा साथ जरुर देंगे...

Saturday, May 8, 2010

"प्रकृति माँ" तुझे सत-सत नमन

र्मी का मौसम किसे अच्छा लगता है...शायद किसी को नहीं खासकर बच्चों को तो बिल्कुल नहीं। फिर भी खेलना तो है ही नटखट मन मानने वाला कहां है...गर्मी पसंद हो या हो किसी के रोके कहां रुकने वाला है ये। और ये चंचल मन रुके भी क्यों, चिलचिलाती गर्मी और थका देने वाली गर्म हवा का सामना करने के लिए हमारी मां जो हमारे साथ हैं। शरीर जलाने वाली गर्म हवा का हम पर कोई असर नहीं होता...खेतों में हल चलाने वाला किसान हो या सामान ढोता मज़दूर...पूरे दिन काम करने के बाद भी अगर स्वस्थ हैं तो ठण्डक देने वाली अपनी प्रकृति मां की गोद में...जिसके आंचल में समायी ममता के साए ने हमको महफूज़ रखा है। गर्मी ही क्या कोई भी मौसम हो मां की छांव में वो आराम है, जो कभी अपनी भूखी औलाद का पेट भरती है तो कभी थक जाने पर सुकून भरी नींद देती है। आखिर मां होती ही अनमोल है। फिर वो चाहे हमें दुनिया देखने का सौभाग्य देने वाली मां हो या फिर वो हमारे आशियाने की तरह, या फिर हमें स्वस्थ रखने वाली, कई रोगों से बचा, कई मायनों में हमारे परिवार के चेहरे पर मुस्कुराहट बिखेरने वाली प्रकृति मां हो। मां तो बस मां है, आज पूरी दुनिया में मदर्स डे मनाया जा रहा है। बच्चे से लेकर बड़े अपनी मां का आज के दिन शुक्रिया करना नहीं भूलते क्योंकि मां वो है जिसने हमें अच्छाई और बुराई में फर्क करना सिखाया, भलाई के रास्ते पर चलना सिखाया, वो हर रात तब तक जागी जब तक नींद हमारी आंखों को छू गयी, उसने पहले हमें खिलाया फिर खुद खाया। हम चाहें भी तो मां के ऋणों से नहीं उभर सकते। फिर हम धरती पर भगवान का रुप मां की इस सीख को कैसे नजरअंदाज कर जाते हैं कि हमारी एक और मां है, प्रकृति मां जिसने भले ही हमें जन्म दिया हो, लेकिन धरती को इतना खूबसूरत बनाया है कि इसे ही देखने के लिए हम अपनी जन्म देने वाली मां के आभारी हैं...तो फिर आज के दिन हम उसे कैसे भूल सकते हैं। शुक्रिया करिए अपनी मां का और शुक्रिया करिए उस मां का जिसने आजतक हमें सिर्फ दिया है, मांगा कुछ नहीं और इसी वजह से हम आज उसके लिए कुछ करना ही भूल गए हैं। मदर्स डे मनाइए। अपनी मां के साथ प्रकृति मां के साथ...और एक संकल्प के साथ आगे बढ़िये...खत्म होने देंगे हम इस कुदरत के अस्तित्व को साथ देंगे बचाने के लिए ममता की इस छांव को...
HAPPY MOTHER’S DAY…….